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चीन पर निर्भरता और बहिष्कार की राजनीति..!
July 11, 2020 • Admin

इस बात में कतई दो राय नहीं है कि आज चीन दुनिया की दूसरी आर्थिक महाशक्ति के रूप में अग्रसर है। लेकिन इसमें भी दो राय नहीं है कि उसकी विस्तारवादी विदेश नीति के कारण, उसके सभी पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद चल रहा है। भारत के साथ चीन का सीमा विवाद काफी पुराना है। इसके बावजूद वर्ष 1967 के बाद से 2017 तक, भारत चीन सीमा पर शांति बनी रही..? पिछले कुछ वर्षों में, सीमा पर विवाद बढ़ा है..! चीन ने, न सिर्फ हमारी सीमा पर अतिक्रमण किया है। बल्कि आर्थिक रूप से भी, हम पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश की है।

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अतिक्रमण किया है। बल्कि आर्थिक रूप से भी, हम पर प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश की है।
क्या आप जानते हैं, कि भारतीय स्टार्टअप्स में चीनी कंपनियों का कितना बड़ा निवेश है..? डेटा और एनालिटिक्स फर्म GlobalData के आंकड़ों के अनुसार, पिछले चार साल में भारतीय स्टार्टअप में चीन के इन्वेस्टमेंट में 12 गुना वृद्धि हुई है। 2016 में इन स्टार्टअप में चीन की कंपनियों का निवेश 381 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 2,800 करोड़ रुपये) था जो 2019 में बढ़कर 4.6 बिलियन डॉलर (लगभग 32 हजार करोड़ रुपये) हो गया है। भारत की कई कंपनियों में चीन का निवेश है जिनमें से स्नैपडील, स्विगी, उड़ान, जोमैटो, बिग बास्केट, बायजू, डेलहीवेरी, फ्लिपकार्ट, हाइक, मेकमायट्रिप, ओला, ओयो, पेटीएम, पेटीएम मॉल, पालिसी बाजार प्रमुख हैं।
ग्लोबलडाटा के अनुसार भारत के 24 भारतीय स्टार्टअप्स में से 17 स्टार्टअप में चीन की अलीबाबा और टेंसेंट जैसी कम्पनियां कॉरपोरेट निवेश कर रही हैं। अलीबाबा और सहयोगी कंपनी ने पेटीएम, स्नैपडील, बिगबास्केट व जोमैटो में 2.6 बिलियन डॉलर लगाया है। जबकि टेंसेंट (Tencent) ने अन्य के साथ पांच यूनिकार्न जैसे ओला, स्विगी, हाइक, ड्रीम 11 और बायजू (BYJU) में 2.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का निवेश किया है। ये स्टार्टअप एक अरब डॉलर या उससे अधिक बाजार मूल्य वाले हैं।
ग्लोबलडाटा के प्रमुख प्रौद्योगिकी विश्लेषक, किरण राज के अनुसार पिछले साल में चीन के साथ तनाव की स्थिति न होने के कारण चीन ने भारतीय बाजार में कम समय में बहुत ज्यादा वृद्धि की है और भारतीय टेक स्टार्ट-अप्स पर काफी दांव लगाए हैं जो उसके लिए काफी फायदेमंद भी साबित हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक, एक अरब डालर से अधिक मूल्य वाली 30 में से 18 स्टार्टअप्स कंपनियों में चीन की प्रमुख हिस्सेदारी है। इकोनोमिक टाइम्स में छपी खबर के अनुसार देश के स्टार्टअप में निवेश करने वाली चीन के अन्य प्रमुख निवेशकों में मेटुआन-डाइनपिंग, दिदी चुक्सिंग, फोसुन, शुनवेई कैपिटल, हिलहाउस कैपिटल ग्रुप और चीन-यूरेसिया एकोनॉमिक को-ओपरेशन फंड शामिल हैं। भारत के टॉप 30 यूनिकॉर्न्स (1 अरब डॉलर से ज्यादा मूल्य के स्टार्टअप्स) में से 18 चीनी फंड और तकनीक से संचालित हैं। इसी वर्ष फरवरी में प्रकाशित इस रिपोर्ट में चीन के फंड से पोषित 92 प्रमुख स्टार्टअप की सूची दी गई है। रणनीतिक निवेश के जरिए भारतीय कारोबारों में शामिल प्रमुख चीनी फर्मों में अलीबाबा, टेनसेंट और बाइटडांस हैं। अकेले अलीबाबा ग्रुप ने ही बिग बास्केट (25 करोड़ डॉलर),पेटीएम डॉट कॉम (40 करोड़ डॉलर), पेटीएम मॉल (15 करोड़ डॉलर), जोमेटो (20 करोड़ डॉलर) और स्नैपडील(70 करोड़ डॉलर) में रणनीतिक निवेश किया हुआ है।
2008 में जबसे दुनिया की अर्थव्यवस्था कमजोर हुई है तबसे चीन की इकोनॉमी में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है। चीन ने अमेरिका की अर्थव्यवस्था से उलट मिडिल ईस्ट और अफगानिस्तान-पाकिस्तान में आतंकवादियों की मदद कर पैसे कमाए। हाल के सालों में दुनिया के लगभग हर देश ने चीन के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए। चूंकि, भारत भी उभरते ग्लोबल पावर में अहम स्थान रखता है, इसलिए उसने भी चीन से अपने रिश्ते मजबूत किए।
दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था में चीन कई तरीकों से दखल देता है। चाहे वो सीधे तौर पर हो या फिर दूसरे देश की तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के जरिए। आधिकारिक तौर पर चीन ने भारत में 2.34 अरब डॉलर रुपए का इन्वेस्टमेंट किया है। लेकिन कुछ ओब्जर्वर्स और एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीन ने इससे भी ज्यादा पैसे भारत में इन्वेस्ट किए हैं। उनके मुताबिक, ये अमाउंट 6 बिलियन डॉलर से ज्यादा है। जबकि कुछ इसे 8 बिलियन डॉलर बता रहे हैं।
गूगल सर्च चाइनीज इन्वेस्टमेंट को लेकर ये साफ बताता है कि चीन ने भारत के स्टार्टअप में काफी पैसा लगाया है।
चीन के जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ कस्टम्स के मुताबिक, 2019 के 11 महीनों में, यानी जनवरी से नवंबर तक चीन से भारत में हुए एक्सपोर्ट की कुल राशि 68 बिलियन डॉलर थी जबकि इम्पोर्ट की राशि 16.32 बिलियन डॉलर थी। यानी कि चीन और भारत के बीच इस व्यापार में 51.62 बिलियन डॉलर चीन के फेवर में इन्वेस्ट की गई।
बात अगर CARE रेटिंग्स की करें तो चीन से भारत में हुआ इम्पोर्ट 2016 से 2019 के बीच 4.48% की दर से बढ़ा, जबकि चीन में 23% की ग्रोथ देखी गई। पिछले पांच – छह वर्षों में अगर देखा जाए तो चीन ही वो देश है, जो भारत के कई स्टार्टअप्स में पैसे लगाता है। वेंचर इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 से 2019 तक चीन ने भारत के स्टार्टअप्स में 5.5 बिलियन डॉलर इन्वेस्ट किया है।
चीन और भारत के इंडस्ट्रियल रिलेशन काफी गहरे हैं। डन और ब्रैडशीट के मुताबिक़, चीन ने भारत में थोक दवाओं के व्यापर में 68% मदद की है। वर्तमान सीमा विवाद के कारण कई भारतीय व्यापारियों का दवाओं में उपयोग होने वाला कच्चा माल क्लियरिंग के लिए फंसा हुआ है जिसकी शिकायत उद्योग मंत्रालय से की गई है। जबकि इलेक्ट्रॉनिक्स में ये हिस्सा 43.2% है। कपड़ों के बाजार में 27% और ऑटो सहायक के बाजार में चीन ने भारत को 8.6% की मदद दी है। इन दिनों दुनिया भर में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की मांग बढ़ गई है। चीन ने इसमें भी पूरी दुनिया के 70 प्रतिशत हिस्सेदारी पर हक बनाया है।
अमेरिकी थिंकटैंक कौंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की विशेषज्ञ एलिसा आयर्स ने हाल में ही लिखा है कि चीनी प्रभाव को रोकना है, तो उसके पूँजी निवेश पर नजर रखनी चाहिए। वैसे ही जो काम अमेरिका में कमेटी ऑन फॉरेन इनवेस्टमेंट (सीएफआईयूएस) करती है।
भारत और चीन के बीच बड़े स्तर पर कारोबारी रिश्ते बन चुके हैं। दोनों देश ब्रिक्स के सदस्य हैं और चीनी पहल पर शुरू हुए एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) में दूसरे नंबर पर भारत की पूँजी लगी है। भारत हाल में शंघाई सहयोग संगठन का सदस्य भी बना है।
चीनी सहयोग की ज्यादातर गतिविधियाँ 2014 के बाद शुरू हुई हैं। बल्कि ये कहना ज्यादा सही होगा कि 2014 के बाद चीन से व्यापार एकतरफा हो गया। चीन से आयात ज्यादा हुआ है और निर्यात कम। उस साल तक भारत में चीन का कुल निवेश 1.6 अरब डॉलर था। ज्यादातर निवेश इंफ्रास्ट्रक्चर में था, जिसमें चीन की सरकारी कंपनियाँ काम कर रही थीं। इसके अगले तीन साल में यह निवेश बढ़कर पाँच गुना करीब 8 अरब डॉलर का हो गया। निवेश में महत्वपूर्ण बदलाव था सरकारी कार्यक्रमों से हटकर उसका बाजार के मार्फत आना, जो चीन के निजी क्षेत्र की रणनीति थी। सरकारी आँकड़ों से वास्तविक निवेश का पता नहीं लग पाता है। खासतौर से निजी क्षेत्र के निवेश का पता नहीं लग पाता। एक तो तकनीकी क्षेत्र की सभी कंपनियों के आँकड़े नहीं मिलते, दूसरे जो निवेश किसी तीसरे देश, मसलन सिंगापुर वगैरह के मार्फत आता है, उसका तो जिक्र भी नहीं होता।
आज भारत की वास्तविक सच्चाई ये है कि महानगरों से लेकर दूर, देहात, कस्बों तक चीन का व्यापार फैला हुआ है।
भारतीय अर्थव्यवस्था का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र है, जहां चीनी वस्तुओं का दखल न हो..? यहां तक कि रक्षा उपकरणों से लेकर वर्तमान कोरोना महामारी से निपटने के लिए भी हम, कुछ दिन पहले तक चाहे टेस्टिंग किट हो या फिर पीपीई किट या वेंटिलेटर, हम उसके लिए भी चाइना पर निर्भर थे। (अब इन वस्तुओं का निर्माण हम व्यापक स्तर पर अपने देश में भी करने लगे हैं) कोरोना महामारी से निपटने के लिए बनाया गया पीएमकेयर फंड में 9678 करोड़ रुपए आये है जो चीन से जुड़े हैं?
कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने आरोप लगाया है कि पीएम केयर फंड में 9678 करोड़ रुपए चीनी कंपनियों ने दान के रूप दिया है जिनमें, सात करोड़ रुपए हुवई ने दिए हैं जो चीनी सेना पीएलए से संबंधित है। पेटीएम ने सौ करोड़, ओप्पो ने एक करोड़, जिओमी ने 15 करोड़ और टिक टॉक ने 30 करोड़ रुपए दिए हैं। ये खबर कई न्यूज वेबसाइट पर उपलब्ध है।
लेकिन लद्दाख प्रकरण के बाद से देश में चीनी माल को बहिष्कार करने का अभियान चल रहा है। ऐसे अभियानों को जनता का भावनात्मक समर्थन मिलता है, पर व्यावहारिक धरातल पर इनमें दम नहीं होता। अक्सर ऐसे अभियान आत्मघाती होते हैं। हम भूल जाते हैं कि इस तरह के कृत्य से हम चाइना के साथ साथ भारतीय व्यापारियों का भी नुकसान करने लगे हैं। थोक बाजारों में हमें इसका झलक दिखने लगा हैं।
29 जून 2020 को सूचना और प्रोद्योगिकी मंत्रालय भारत सरकार द्वारा जारी एक आदेश के अनुसार, भारत में डाटा की प्राइवेसी और राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए, 59 चाइनीज मोबाइल ऐप को प्रतिबंधित कर दिया गया है। जिनमें सबसे ज्यादा लोकप्रिय, लगभग 12 करोड़ यूजर वाला टिक टॉक शामिल हैं। (वहीं टिक टॉक जिसने पीएम केयर फंड में 30 करोड़ रुपए का दान दिया है) जबकि इसी वर्ष 17 मार्च को भाजपा के एक सांसद सुभाष सरकार ने लोक सभा में गृह मंत्रालय से लिखित सवाल पूछा था कि क्या सरकार को अमेरिकी खुफिया विभाग से कोई ऐसी जानकारी मिली है कि टिक टॉक के इस्तेमाल से भारत पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है..? और क्या इसे बैन करने की कोई योजना है..? तब गृह राज्य मंत्री किशन रेड्डी ने कहा था कि टिक टॉक को बैन करने की कोई योजना नहीं है। फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक इतने सारे चीनी ऐप सुरक्षा कारणों से प्रतिबंध कर दिया गया..?
भारत की सरकार ऐप्स पर हमलावर है न कि मोबाइल कंपनियों पर जो डेटा चोरी में ज्यादा माहिर हैं।
इन ऐप्स को प्रतिबंधित करने से चीन को कितना नफा नुकसान होगा ये अभी देखना होगा..? जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था में अपनी जड़े जमा चुके पेटीएम जैसे ऐप पर कोई प्रतिबंध नहीं है..?
चीन धोखेबाज़ है, ये बात भारत को 1962 से पता है। लेकिन अब प्रचारित किया जा रहा है कि चीन ने मित्रता की आढ़ में धोखा दिया..। जबकि प्रधानमंत्री के तौर पर सबसे ज़्यादा बार मोदी जी चीन जा चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर 18 बार शी शिनपिंग से मिल चुके हैं। और लगभग हर मुलाकात के वक़्त भारतीय उद्योगपतियों का एक प्रतिनिधि मंडल उनके साथ रहता था। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए चीन के गुण गाते रहते थे। क्या कभी किसी गैर भाजपा प्रधानमंत्री ने चीन के साथ इतनी निकटता रखी? हमेशा औक़ात में रखा। आज चीन को जिन लोगों ने सर पर चढ़ाया.. वहीं लानत मलानत कर रहे हैं।
सीमा पर सैन्य स्तर की बातचीत चल रही है। और हमे उम्मीद करनी चाहिए कि अपने अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए जल्द ही इस विवाद का कोई हल निकलेगा..?