ALL राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत समाचार तिथि / पंचाग कथा / कहानियां शास्त्रों से धार्मिक पर्यटन स्थल विचार / लेख
दो दिवसीय अनुवाद विमर्श में मिले इस विधा का महत्व बढ़ाने के सुझाव
February 25, 2020 • Admin

भोपाल। हिंदी साहित्य सम्मेलन के आमंत्रण पर भोपाल में  22 और 23 फरवरी को देश भर के अनुवादक एकत्र हुए। दो दिवसीय अनुवाद विमर्श कार्यक्रम पहले दिन स्वराज भवन सभागार,रविन्द्र भवन और दूसरे दिन  मायाराम सुरजन भवन में आयोजित हुआ। भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अनुवाद की ज़रूरत और चुनौतियां विषय पर हुए इस विमर्श में केरल, बंगाल, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, दिल्ली, ओडिसा,गुजरात एवं छत्तीसगढ़ से आए रचनाकारों ने अपनी भाषाओं  में और उन रचनाओं के हिन्दी अनुवाद का पाठ भी किया। हिंदी साहित्य सम्मेलन के महामंत्री मणि मोहन ने की शुरुआत करते हुए इस कार्यक्रम के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने भारतीय भाषाओं के मध्य परस्पर संपर्क बढ़ाने और श्रेष्ठ रचनाओं का संदेश बड़े  वर्ग तक पहुंचने की मंशा से इस कार्यक्रम की रूपरेखा बनाई है।सुश्री मालिनी गौतम ने कहा कि उन्होंने गुजरात के साहित्यकार नीरव पटेल के दलित  साहित्य  को अनुवाद के माध्यम से हिन्दी और अन्य भाषाओं के पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया है ।भरत यादव ,शोलापुर (महाराष्ट्र)ने मराठी से हिन्दी  अनुवाद के अनुभव बताए।संध्या कुलकर्णी ने  कहा कि यह देखना जरूरी है कि अनुवाद में मूल भाव लुप्त न होने दिया जाए। उत्पल बैनर्जी ,इंदौर ने कहा कि साहित्य सिर्फ  समाज का दर्पण ही नहीं, समाज को सही राह भी दिखाता है। सुनीता डागा ने कहा कि अनुवाद बहुत प्राचीन विधा है। एक औसत कविता लिखने से अच्छा है,एक अच्छी कविता का अनुवाद किया जाए।संतोष एलेक्स ( केरल) ने मलयालम,तेलगु और तमिल से हिंदी अनुवाद किए हैं।उन्होंने कहा कि अनुवाद में हिन्दी का लिंक भाषा के रूप में बहुत महत्व है । हिन्दी से सिन्धी और सिन्धी से हिन्दी  में अनेक पुस्तकों का अनुवाद कर चुकी लेखिका रश्मि रमानी ,इंदौर ने कहा कि अनुवाद में एक त्रुटि भाषा का सौंदर्य बिगाड़ देती है। ओडिय़ा और पंजाबी से हिन्दी में अनुवाद करने वाले कुलजीत सिंह ने कहा कि अनुवाद में मूल भाषा का आस्वाद मिलना चाहिए। मीता दास,भिलाई (छत्तीसगढ़) ने बांग्ला से हिन्दी अनुवाद के अनुभव बताए।उन्होंने कहा कि अनुवाद का कार्य परकाया  प्रवेश की तरह होता है । बांग्ला में सैकड़ों लघु पत्रिकाएं अनुवाद की हुई रचनाएं प्रकाशित करती हैं और वहां लेखक की तरह अनुवादक का नाम स्थापित हो चुका है। सारिका ठाकु,भोपाल कहा कि अनुवाद में मूल लेखक के अंतस  में उतरकर कार्य करना होता है। सारिका ने पिता की मैथिली रचनाओं के अनुवाद के अनुभव  भी बताए।सांगली  महाराष्ट्र से आए कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बलवंत जेऊरकर ने कहा कि अनुवाद का योगदान यह है कि किसी समृद्ध भाषा से अनुवाद हो तो वह भाषा दस-पन्द्रह बरस आगे बढ़ जाती है। पंजाबी से हिंदी में छह सौ से अधिक कहानियां अनूदित कर चुके अध्यक्षता कर रहे सुभाष नीरव,दिल्ली ने कहा कि इस अनुवाद विमर्श में अनुवाद के लगभग सभी पक्ष सामने आए और गहन विचार प्रक्रिया हुई है जो अनुवादकों की गंभीरता की परिचायक है।  कार्यक्रम के दूसरे सत्र में सभी प्रतिभागी रचनाकारों ने अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अनूदित रचनाओं का पाठ किया, जिसे उपस्थित श्रोताओं ने बेहद सराहा। मीता दास इस सत्र की मुख्य अतिथि थीं।इस सत्र की अध्यक्षता कुलजीत सिंह ने की.  हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष श्री  पलाश सुरजन ने आभार व्यक्त करते कहा कि संभवत: पहली बार ऐसा अभिनव कार्यक्रम भोपाल  में हुआ है।अब तक  साहित्यिक अनुवाद की विधा को उतना महत्व नहीं दिया गया है जबकि यह किसी संस्कृति को अन्य भाषा भाषियों और विशाल पाठक वर्ग तक पहुंचने का माध्यम है। श्री सुरजन ने कहा कि मप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से अनुवाद पर ऐसा आयोजन हर साल होगा और साथ ही अनुवाद पर केंद्रित पत्रिका के प्रकाशन पर विचार किया जाएगा।सभी प्रतिभागियों ने भोपाल झील सहित आसपास के पर्यटक  स्थल भी देखे।श्री रघुराज सिंह,राग तैलंग,हीरालाल नागर,अभिषेक वर्मा,पदम भंडारी,मोहन सगोरिया,कांता राय के अलावा शहर के अनेक कलमकार सत्रों में उपस्थित हुए।सम्मेलन की तरफ से अनुवाद विमर्श के  सभी प्रतिभागी को स्मृति चिन्ह, शाल और पुस्तकें प्रदान क